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साहित्य दर्पण

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यथार्थ के दोहे

कुछ यथार्थ … चादर ओढ़े सत्य की, गाते झूठे गीत।चिकनी चुपड़ी बात से,बनते झूठे मीत।। ऐसे झूठे मीत से,रहो नित सावधान।जाने कब करने लगे,तुम पर ही संधान।। मीत समझना उसे जो,सदा निभाये साथअवसरवादी हो नहीं, कभी न छोड़े हाँथ।। जलन अगर कोई करे , मत देना तुम ध्यान।बढ़ते रहो नित लक्ष्य पर,अशोक जानो ज्ञान।। हांथोंपढ़ना जारी रखें “यथार्थ के दोहे”

दो लब्ज़

मुस्कुरा कर के जी लें जीवन का हर पल यहाँ,कौन किसने कब है देखा होगा कैसा कल यहाँ।नफरतों की आँधियों को आओ मिलकर रोक लें,गर समस्या सामने है तो उसका मिलेगा हल यहाँ।। प्रेम की पावन डगर पर पग दो पग आओ चलें,आसमाँ छूने की हजारों हसरतें मन में पलें।करुणा दया के भाव अब पुस्तकोंपढ़ना जारी रखें “दो लब्ज़”

लेखनी बनी है प्रेयसी

लेखनी बनी है प्रेयसी लेखनी बनी है प्रेयसी छोड़ इसे ना पाऊंगा।संग में इसके मैं सदा ही गीत प्रेम के गाऊंगा।। मन के भावों को सजाती उर के तारों को बजाती।कुछ नया लिखने की खातिर प्रेरणा के गीत गाती।चाहकर भी हाँथ अपने रोक नहीं अब पाऊंगा।लेखनी बनी है प्रेयसी… प्रतिभा मुझमे भी छिपी है अबपढ़ना जारी रखें “लेखनी बनी है प्रेयसी”

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